
जीवन जीता हूँ पर उससे भी समझ नहीं पाता हूँ
दर्द के एहसास से मायूष सा हो जाता हूँ
इस दुनिया में खुद को बेबस सा पाता हूँ
कितना सहता हूँ पर कुछ कह नहीं पाता हूँ
इन जख्म के दर्द में नींद को आँखों से ओझल पाता हूँ
इतना कमज़ोर हूँ की खुद का भोझ उठा नहीं पाता हूँ
बस आशाओं को नाउमीद करता चला जाता हूँ
बंधन है खुले फिर भी सांसो को जकडा पाता हूँ
हार गया अब मैं दूसरा जीवन चाहता हूँ.


