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June 29, 2009

Mein Doosra Jeevan Chahta hoon


बंधन है खुले फिर भी सांसो को जकडा पाता हूँ
जीवन जीता हूँ पर उससे भी समझ नहीं पाता हूँ

दर्द के एहसास से मायूष सा हो जाता हूँ
इस दुनिया में खुद को बेबस सा पाता हूँ

कितना सहता हूँ पर कुछ कह नहीं पाता हूँ
इन जख्म के दर्द में नींद को आँखों से ओझल पाता हूँ

इतना कमज़ोर हूँ की खुद का भोझ उठा नहीं पाता हूँ
बस आशाओं को नाउमीद करता चला जाता हूँ

बंधन है खुले फिर भी सांसो को जकडा पाता हूँ
हार गया अब मैं दूसरा जीवन चाहता हूँ.

3 comments:

  1. Su thayu ankit bhai...

    itna mota kyun hai ki bojh lagne laga hai tu khud ko...??

    :P

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  2. Its a nice one BUT Waiting for some positive vibes in ur upcoming poems!!

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  3. y so negative dis tym....i have alwz read u positive...waiting 4 sumthng positive :)

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