
इस भीड़ भरी दुनिया में अपने को खोया पता हूँ
हर ज़ंग हर लड़ाई में अपने को सोया पता हूँ
कुछ समझ नही आता की में ख़ुद से क्या चाहता हूँ
जो मिलता है उसमे भी कुश नही रह पता हूँ
मासूम सा चेहरा देख मुश्कुरा सा जाता हूँ
पर इस मतलबी दुनिया में अपनों को ही समझ नही पता हूँ
ख़ुशियो का मोल लगते लोगों में अपने आप को ठगा पता हूँ
आंसुओ की धारा में बस बेह्ता चल जाता हूँ
दर्द तो मेरी परछाई है इससे ही पीछा छुड़ाता हूँ
पर बिने इसके ख़ुद को अधुरा पता हूँ
में ज़िन्दगी
इस भीड़ भरी दुनिया में अपने को खोया पता हूँ
में ज़िन्दगी
हर ज़ंग हर लड़ाई में अपने को सोया पता हूँ




