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March 8, 2008

Kyun


क्यों हम जीतें है क्यों हम लड़ते है
क्यों इस चक्कर में थक थककर मरते है

शाबित कुछ करना है शाबित कुछ करते है
इसी चक्कर में बार बार गिरकर शम्भलते है

क्यों हम जीतें है क्यों हम लड़ते है
क्यों इस चक्कर में थक थककर मरते है

आशाए मरती हैं तमन्नाये दफनाई जाती है
मरने से पहले ही लाशों की तरह चलते है

क्यों हम जीतें है क्यों हम लड़ते है
क्यों इस चक्कर में थक थककर मरते है

प्यार कई रंगो में आता है कई सपने सजाता है
क्यों हम नही समझते क्यों इसे भी परखते है

क्यों हम जीतें है क्यों हम लड़ते है
क्यों इस चक्कर में थक थककर मरते है

4 comments:

  1. Hii Ankit.,
    well awesome poetry..
    really mesmerising and heart touching..
    lage raho!!!!!

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  2. heyyyyy

    mast poerty hai
    nirma mai ye sab kab se padhne lage
    tu pahile to aisa nahi tha

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  3. by the way, meri bhi ek poem ka title kyon hai.... tumhare jitni acchi na sahi par ek prayaas hai...

    time mile to dekhna

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