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December 9, 2008

Mein Zindagi


इस भीड़ भरी दुनिया में अपने को खोया पता हूँ
हर ज़ंग हर लड़ाई में अपने को सोया पता हूँ

कुछ समझ नही आता की में ख़ुद से क्या चाहता हूँ
जो मिलता है उसमे भी कुश नही रह पता हूँ

मासूम सा चेहरा देख मुश्कुरा सा जाता हूँ
पर इस मतलबी दुनिया में अपनों को ही समझ नही पता हूँ

ख़ुशियो का मोल लगते लोगों में अपने आप को ठगा पता हूँ
आंसुओ की धारा में बस बेह्ता चल जाता हूँ

दर्द तो मेरी परछाई है इससे ही पीछा छुड़ाता हूँ
पर बिने इसके ख़ुद को अधुरा पता हूँ

में ज़िन्दगी
इस भीड़ भरी दुनिया में अपने को खोया पता हूँ
में ज़िन्दगी
हर ज़ंग हर लड़ाई में अपने को सोया पता हूँ

2 comments:

  1. I loved this one....
    just because it had its own touch of innocence....an imagingation left ignorant by the society...and most of it all...its what life is all about...

    keep it up !!

    ReplyDelete
  2. I loved this one....
    just because it had its own touch of innocence....an imagingation left ignorant by the society...and most of it all...its what life is all about...

    keep it up !!

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